मंगलवार, 19 जनवरी 2016

अहंकार का खारापन

अहंकार का खारापन
पत्नी विछोह में व्याकुल राम
समुद्र से रास्ता देंने को कर रहे थे मनुहार,
पर समुद्र को था अपनी विशालता का अहंकार,
नहीं समझ पा रहा था वह परमपिता के धैर्य को,
वनवासी वेष में अपने ही जन्मदाता के शौर्य को,
काल बलशाली है, पिता इस स्वरूप में मज़बूर है,
पर पिता से ही पायी शक्तियों के बल पर
समुद्र आज मगरूर है,
जिनकी शक्ति से ही श्वास है, व्यक्तित्व है,
धरा पर शासन है, अस्तित्व है,
समुद्र को अहंकार हो गया कि मेरा ही जन्मदाता
मेरे आगे नतमस्तक खड़ा है,
मुझसे भीख पाने के लिए मेरे चरणों पर पड़ा है,
जलधि अहंकार में भूल गया था मर्यादा को,
विनय की मुद्रा में सामने खड़े पिता को, विधाता को,
राम को विनय करते देख
भ्रमित और क्रुद्ध था लक्ष्मण,
क्योकि परमपिता के मात्र श्राप से छिन सकता था
समुद्र का सब कुछ तत्क्षण,
जलधि के अहंकार और राम की धैर्यता के तीन दिन,
संयम को क्रोध में परिवर्तित होने के तीन दिन,
राम द्वारा माँ सीता के विछोह के अतिरिक्त तीन दिन,
अहंकार को विनम्रता में परिवर्तित होने के तीन दिन,
क्षमा के बावज़ूद तीन दिन का अहंकार,
अपने पिता से किया गया अनुचित व्यवहार,
की गयी ध्रष्टता के निशान छोड़ गया है,
जलधि को उसका खारापन
उसके अस्तित्व से जोड़ गया है,
आदर, सम्मान और विनम्रता लाती है मीठापन
जिसके लिए समुद्र तरस रहा है,
आज भी खारेपन से कलंकित है
जबकि दर-ब-दर मीठा पानी लिए बरस रहा है,
गोपालजी
9936605508

सोमवार, 15 अगस्त 2011

बापू की बकरी बिलकुल आज़ाद है


कसाई भी बकरे की गर्दन उड़ाने से पहले

दूकान के आगे पर्दा लगा देता है,
अजनबियों को बाहर भगा देता है,

पता नहीं कौन चर्चा फैला दे
कि कसाई, वाकई कसाई होता है,
रहमदिली दूर की बात है उसके लिए
वो सिर्फ खून और गोश्त का सौदाई होता है,

खूंटे से बंधा निरीह बकरा देखता है सब,
परदे को खिंचते हुए,
लोंगो को बाहर जाते हुए,
गंडासे में धार लगते हुए,
और गंडासा लिए हाथ को
अपनी गर्दन के ऊपर उठते हुए,

सामुहिक विद्रोह की शक्ति न रखने वाला बकरा
थोड़े से चारे की लालच में अपनी जान गंवा देता है,
और अन्नदाता की खाल में छिपे भेडिए को
अपने ही गोश्त और खून का सौदाई बना देता है,

आज राजनीति और कसाई की दूकान में
कोई फर्क नहीं है ,
और राजनीति में तो
जिबह से बेहतर कोई गुडवर्क नहीं है,
विडम्बना है कि अब बकरे खुद
कसाई का चुनाव करते हैं,
और फिर बा-इत्मिनान मरते हैं,

नारियों में परदे की क्वालिटी पहचानने
और लगाने का जन्मजात गुण है,
और फिर बाहर से अन्दर कुछ न दिखे
इसमें पर्दा खुद निपुण है,

दूकान दिलाने वाले “बापू” को भी
ऊपर से पर्दा ही दिख रहा है,
उन्हें नहीं पता कि दूकान के पीछे वाली नाली से
उनकी अपनी बकरी का खून रिस रहा है,

गोपालजी

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

वैलेनटाइन डे पर अपने वैलेनटाइन को समर्पित

पता नहीं क्यूँ वैलेनटाइन डे के इस पक्ष पर आज आँखे क्यूँ नम हो गयी और छलक पड़ी बीते पैंतीस बरस की यादों को बूंदों में समेट कर ।  आ गयी थी वो मेरी जिंदगी में निर्विकार कच्ची मिटटी की तरह एक नए रिश्ते की आड़ लेकर,  और न्योछावर कर दिया अपना तन, मन और आत्मा मेरे तथा मेरे परिवार के लिए, बना लिया वह अटूट रिश्ता जिसके टूटने का ख्वाब भी हृदय विदारक है.

 सच्चे अर्थों में  वैलेनटाइन डे पति-पत्नी के अटूट प्रेम का उत्सव मनाने का दिन है, जिस प्रेम की बुनियाद भी वो खुद रखते हैं, एक संसार बनाते है, आत्मसात कर लेते है उस संसार में खुशहाली लाने को अपने को और ख़त्म हो जाते है एक नए संसार की रचना कर के.
माँ के बाद अगर कोई पवित्र और निःस्वार्थ प्रेम करता है मनुष्य को इस संसार में तो वह है उसकी पत्नी. इस उत्सव पर्व पर उसको दो शब्द समर्पित करता हूँ :

कुछ जितने की चाह नहीं आपके बिनाँ
ज़न्नत सी ऐ ज़मीं उन्मुक्त आसमान ,
फिर जीत के भी क्या करेंगे आप ग़र न हों
फूलों को चुन के क्या करेगा उजड़ा बागबां,

चन्दन सी महकती है फिजां  सिर्फ आपसे
आ जाता है नज़रों में नूर सिर्फ आपसे
खुश है मेरा हर रोम रोम सिर्फ आपसे
सिर्फ आपसे हो जाता है दिल फिर से नौजवां
              कुछ जितने की चाह नहीं आपके बिनाँ.....

तेरी छुवन से लय मेरे लम्हों में आती है
यौवन की बुझी आग बस तू ही जगाती है
आँखें बचा के सबकी  अबभी छेड़ जाती है
फिर रूठ के करती मुझको अबभी परेशाँ
               कुछ जितने की चाह नहीं आपके बिनाँ.......

तुमने ही दिया है मुझे जीवन में सभी ख़ास
किलकारियां आँगन में और नित नया मधुमास
अश्कों को मेरे पोंछने बस तुम ही रहे पास
वर्ना सभी ने छोड़ दिया मेरा कारवां
                   कुछ जितने की चाह नहीं आपके बिनाँ......

गोपालजी

वैलेनटाइन डे पर अपने वैलेनटाइन को समर्पित


                 

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

बिट्टी कि विदाई

काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,
तेरे प्यारे बचपन को काहे खुद मार दिया,

हाथों को मल के भी       अब क्या मिलना है ,
दर्दे-विदाई को                 अश्कों से सिलना है,
तेरे भोलेपन का काहे,      मैंने न विचार किया 
       काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

सूना हुआ  कांधा मेरा, सूना हुआ आँगन,
नीर बहाएँ नैना,       बोझिल है तनमन,
तुतली बोली से काहे,  तुने इतना प्यार दिया,
       काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

जाए जहाँ तू बिट्टी,       सदा मुस्कराए
नैन न होयें गीले,         दिल गुनगुनाये
महकाए जाकर जो प्रभु ने, तुझे घर-द्वार दिया,
        काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

इस घर से नाता अपना,    भूल न जाना
ख़ुशी हो या ग़म इस घर का, साथ निभाना
रब ने सिर्फ बेटी को दो घर का अधिकार दिया
      काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

     गोपालजी 

बिट्टी कि विदाई

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

बिट्टी क़ी विदाई

बिट्टी क़ी विदाई 
बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया
बचपन को तेरे मैंने, काहे खुद मार दिया 

हाथों को मल के भी, अब क्या मिलना है 
दर्द भरे दिल को बस, अश्कों से  सिलना है 
तेरे भोलेपन का मैंने, काहे न विचार किया 
           बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

इस घर से नाता अपना, भूल न जाना 
नया घर मिला है, पर ए तेरा है पुराना 
जिसे तुने ही अपने हाथों से संवार दिया 
            बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

सूना लगे कंधा मेरा, सूना लगे आँगन 
अश्क बहाएं आँखें, बोझिल है तन-मन
काहे डैडी/मम्मी  कह के तुने, मुझे  इतना प्यार दिया 
             बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

जाए जहाँ तू बिट्टी, सदा मुस्कराए 
नैन न होयें गीले, दिल गुनगुनाये 
महकाए,  इश्वर ने तुझे जो घर-द्वार दिया  
            बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

                                        गोपालजी  /  मीनाक्षी   

शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ को पत्र

माँ,
कितने गदगद थे हम उस दिन, सच में लगा था तेरे ऊपर होने वाले अत्याचार अब ख़त्म हो गए,
तू भी साँस ले सकेगी अब आज़ादी की, पर सब भ्रम निकला माँ सब झूठ .  आज अहसास हुआ कि
सत्ताएं तो बदल गयीं हमारी किस्मतें नहीं बदलीं. बदलीं हैं तो सत्ता करने वालों कि मानसिकताएं
और निश्चित रूप से उससे भी अधिक घ्रणित स्वरूपों में .
अब तो विश्वास हो चला है कि तुम शायद कभी न आज़ाद हो सकोगी, कल तक तो बाहर वालों का
अत्याचार और लूट खसूट थी, आज तो तेरे बच्चे ही तेरे आँचल को तार-तार करने पर आमादा हैं
बाहरी अक्रमंकारियों से भी अधिक क्रूरता से.
और माँ हम, निश्चित सत्य है कि हम कायर हो चुके हैं, राम कि पूजा करते हैं, कृष्ण का ध्यान
लगाते हैं, पर सब आडम्बर.  हममें आत्मबल सूख गया है, अपने सामने निरीह पर होता अत्याचार
हम बर्दाश्त करते हैं, लोकतंत्र के वासी होकर अंग्रेजों से बदतर लोगों कि गुलामी करते हैं
तुमसे आँख मिलाने का साहस नहीं है इसलिए पत्र लिख रहे हैं, हमें हमारी दशाओं पर छोड़ दो
और क्षमा करना कि हम तुम्हारे लिए कुछ न क़र सके.
  
                                                                                              गोपालजी               
            

शनिवार, 8 मई 2010

माँ

माँ को शब्दों में व्यक्त करूं
इतने मुझमें ज़ज्बात नहीं, 
भाषा, स्याही और कलम की भी 
विश्वास है ए औकात नहीं,
मेरी माँ क्या है मेरे लिए 
लिखना ही हास्यास्पद होगा
माँ साक्षात् खुद ईश्वर है
कोई ईश्वरीय सौगात नहीं,

                              गोपालजी