चाह नहीं होऊं दफ़न कफ़न संग, मिटटी में मिल जाऊं,
शव यात्रा का सत्यबोध बन, शव के संग मिट जाऊं,
बंध कर पाक किताबों में, सुंदर आसन चढ़ जाऊं,
या फिर धर्म ध्वजा पर चढ़ कर, अम्बर में लहराऊं,
कलुषित नेंताओं की मैं, जिंव्हा पर पोषण पाऊं,
देश जाति की आड़ में मानव वैमनस्य भड़काऊं,
हृदयों को उत्तेजित कर मानव हिंसा करवाऊं ,
और खुद बैठ सिंघासन पर इतिहास रचूं सुख पाऊं,
चाह नहीं नग्मों गजलों का बन के दर्द रह जाऊं,
सूर्य की आभा, चाँद का चित्रण करके मन बहलाऊं,
उड़ते पंक्षी का बन कलरव, हवा में गुम हो जाऊं,
या फिर सावन भादों की चर्चा से तपन बुझों,
चाह नहीं किसी नगर वधु की दास्तान बन जाऊं,
उसकी नई सुबह का, बासी फुल बनूँ मुरझाऊं,
तपते यौवन से उसके मैं, निज गरिमा पिघलाऊं,
या फिर डूब सुरा-प्यालों में चिंतन शक्ति गवाऊं,
शब्द बनूँ मैं इश्वर जिससे, अविरल प्रेम झरा हो,
भाषा का मोहताज़ न हो, पर नेह की सुरभि-सरा हो,
दिल से दिल में राग जगाए, उसमें वो मदिरा हो ,
अमृत से संतृप्त हो या रब, तेरा तेज़ भरा हो,
गोपालजी
9455708506
The blog consists my thoughts, bhajans, vyangs, devoted ghazals, my attainments from life and overall a logical view with traditions and all other aspects of life i.e. culture, emotionals, relationship, faith and devotions etc.
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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
सत्य का धरातल
दुर्योधन, उदास और क्लांत
मन में झंझावत, लब शांत ,
नहीं दे सका सुकूं पत्नी का आलिंगन ,
नर्तकियों का सुर-वंदन,
मनोबल है जिंदा, पर टूटा है विश्वास,
क्या इश्वर,
वास्तव में आज नहीं है हमारे पास,
यदि है
तो क्या हो गयी भूल,
क्यों चुभ रहा है हर रोज़
एक नयी हार का शूल,
मैंने तो मात्र
अपने पिता के अपमान का प्रतिघात किया,
सेना की विशालता से भी सिद्ध है
अधिकों ने मेरा साथ दिया,
अपनी पत्नी द्यूत में हारने वाले धूर्तों को
कृष्ण का सरक्षण,
बलराम के आदेश के विरुद्ध
पांडवों की रक्षा प्रतिक्षण ,
भविष्य द्रष्टा कहते थे ऐसा कलयुग में होना है,
असत्य को विजयी सत्य को धरातल खोना है,
लगता है कलयुग अभी से ही आ गया
वर्ना ऐसा न होता,
असत्य यूँ न पूजा जता
सत्य न अपना शौर्य खोता,
" दूर कहीं घड़ियाल घंटा बजा रहा है ,
मुर्दा हुए जिन्दों को शायद बता रहा है .
नैतिक पतन की चादरें लेटे हो ओढ़ कर,
सहमें डरे से सोये हो घुटनों को मोड़कर,
गर्तों की राह जाओ ना तुम सत्य छोड़कर,
वर्ना समय ही सत्य है रख देगा तोड़कर ,
हर गम को हर ख़ुशी को निर्विकार परखना,
ग़र संग चले चिर-नींद तक चिर-सत्य समझना , "
" गोपाल जी "
मन में झंझावत, लब शांत ,
नहीं दे सका सुकूं पत्नी का आलिंगन ,
नर्तकियों का सुर-वंदन,
मनोबल है जिंदा, पर टूटा है विश्वास,
क्या इश्वर,
वास्तव में आज नहीं है हमारे पास,
यदि है
तो क्या हो गयी भूल,
क्यों चुभ रहा है हर रोज़
एक नयी हार का शूल,
मैंने तो मात्र
अपने पिता के अपमान का प्रतिघात किया,
सेना की विशालता से भी सिद्ध है
अधिकों ने मेरा साथ दिया,
अपनी पत्नी द्यूत में हारने वाले धूर्तों को
कृष्ण का सरक्षण,
बलराम के आदेश के विरुद्ध
पांडवों की रक्षा प्रतिक्षण ,
भविष्य द्रष्टा कहते थे ऐसा कलयुग में होना है,
असत्य को विजयी सत्य को धरातल खोना है,
लगता है कलयुग अभी से ही आ गया
वर्ना ऐसा न होता,
असत्य यूँ न पूजा जता
सत्य न अपना शौर्य खोता,
" दूर कहीं घड़ियाल घंटा बजा रहा है ,
मुर्दा हुए जिन्दों को शायद बता रहा है .
नैतिक पतन की चादरें लेटे हो ओढ़ कर,
सहमें डरे से सोये हो घुटनों को मोड़कर,
गर्तों की राह जाओ ना तुम सत्य छोड़कर,
वर्ना समय ही सत्य है रख देगा तोड़कर ,
हर गम को हर ख़ुशी को निर्विकार परखना,
ग़र संग चले चिर-नींद तक चिर-सत्य समझना , "
" गोपाल जी "
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
बेटे की चिठ्ठी
मम्मी, मेरी चिंता मत करना
डैडी से भी कहना, न लें टेंशन मेरी फिक्र से,
उलझाये रखना उनको, बेवजह के ज़िक्र से,
माम, तुमने कहतीं थीं ,
मैं गोद में, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हें ही देखता रहता था
मेरे तुम्हारे बीच कब ऐ जहाँ आ गया
कभी समझाया नहीं,
आज फिर, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हारी गोद में
पहले जैसे निश्चिन्त
सोने का मन करता है
लेकिन तुम पास हो तब ना,
और अब लगता है यह सपना,
बागवां तो खाद-पानी देकर
आस बाँध कर
निश्चिन्त हो जाता है,
बीज को ही संघर्ष कर
अपनी जड़ें ज़माना होता है,
कौन चाहता है अपनी जड़ों दूर रहना,
लेकिन यह नियति है
हंस कर या रोकर
पड़ता ही है दर्द सहना,
माम अपने अश्कों से कहना,
प्लीज़ अब न बहना,
मेरा भी दिल कमज़ोर हो जाता है,
लाख रोकने के बावजूद
आँख के कोने से ढलक कर आंसू
की-बोर्ड को गीला कर ही जाता है,
- तुम्हारा अस्तित्व-
" गोपालजी "
डैडी से भी कहना, न लें टेंशन मेरी फिक्र से,
उलझाये रखना उनको, बेवजह के ज़िक्र से,
माम, तुमने कहतीं थीं ,
मैं गोद में, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हें ही देखता रहता था
आँचल मुठ्ठी से कब छूट गया
तुमने बताया नहीं,मेरे तुम्हारे बीच कब ऐ जहाँ आ गया
कभी समझाया नहीं,
आज फिर, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हारी गोद में
पहले जैसे निश्चिन्त
सोने का मन करता है
लेकिन तुम पास हो तब ना,
और अब लगता है यह सपना,
बागवां तो खाद-पानी देकर
आस बाँध कर
निश्चिन्त हो जाता है,
बीज को ही संघर्ष कर
अपनी जड़ें ज़माना होता है,
कौन चाहता है अपनी जड़ों दूर रहना,
लेकिन यह नियति है
हंस कर या रोकर
पड़ता ही है दर्द सहना,
माम अपने अश्कों से कहना,
प्लीज़ अब न बहना,
मेरा भी दिल कमज़ोर हो जाता है,
लाख रोकने के बावजूद
आँख के कोने से ढलक कर आंसू
की-बोर्ड को गीला कर ही जाता है,
- तुम्हारा अस्तित्व-
" गोपालजी "
शनिवार, 16 जनवरी 2010
परिवर्तन
धरा, प्रकृति और आस्था
परिवर्तनशील अपनी उत्पत्ति से ही
तथा हम मात्र मूल्यों एवं संस्कारों के
परिवर्तन से उत्तेजित और कुंठाग्रस्त,
अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रतिरोध के उपरांत भी
पराजित और पस्त,
क्या समझते हैं हम अपने आपको
ब्रम्ह के नियंता के समक्ष ?
उस विराट के समकक्ष ?
अहंकार ही तो है
हमें चुटकी भर ज्ञान का
और अनावृत कर देता है
हमारा विद्रूपित व्यक्तित्व ,
क्योंकि परिवर्तन
नष्ट कर डालता है अवरोधों को
और निकल जाता है नदी के प्रवाह की तरह
स्वच्छंद, उन्मुक्त, अविरल और आल्हादित ,
और तना रहता है सदैव
पर्वतों की तरह हिम से आच्छादित ,
" गोपालजी "
परिवर्तनशील अपनी उत्पत्ति से ही
तथा हम मात्र मूल्यों एवं संस्कारों के
परिवर्तन से उत्तेजित और कुंठाग्रस्त,
अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रतिरोध के उपरांत भी
पराजित और पस्त,
क्या समझते हैं हम अपने आपको
ब्रम्ह के नियंता के समक्ष ?
उस विराट के समकक्ष ?
अहंकार ही तो है
हमें चुटकी भर ज्ञान का
अपने अस्तित्व का
जो मिटा देता हँ हमारा ही अस्तित्व ,और अनावृत कर देता है
हमारा विद्रूपित व्यक्तित्व ,
क्योंकि परिवर्तन
नष्ट कर डालता है अवरोधों को
और निकल जाता है नदी के प्रवाह की तरह
स्वच्छंद, उन्मुक्त, अविरल और आल्हादित ,
और तना रहता है सदैव
पर्वतों की तरह हिम से आच्छादित ,
" गोपालजी "
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