दीवारों के भी कान होते है,
आखिर कब तक खड़े-खड़े बोर होतीं
इनके भी कुछ अरमान होते हैं,
इसलिए सुनती हैं, खूब सुनती हैं,
कुछ भी इनके बीच कहिये,
ये सुनेंगी, पर कहेंगी किसी से नहीं,
क्योंकि दीवारों के मुह नहीं होते,
कितना बड़ा दुर्भाग्य है इनका
कि जानती तो सब हैं
देखा सुना है सब
पर बता नहीं सकतीं
डरिये उनसे जिनके कान और मुह
दोनों होते हैं,
और वही आपके गुप्त मसलों के
सबसे बड़े दुश्मन होते हैं,
दीवारें बेचारी गवाही तक नहीं देतीं
पर चर्चा उन्हीं के बारे में आम है,
खुराफात करते हैं दुसरे
मुफ्त में दीवार बदनाम है,
गोपालजी
The blog consists my thoughts, bhajans, vyangs, devoted ghazals, my attainments from life and overall a logical view with traditions and all other aspects of life i.e. culture, emotionals, relationship, faith and devotions etc.
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मंगलवार, 16 मार्च 2010
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
चरित्र पर भी चढ़ते हैं. रंगों ने किया कमाल
रंग चले, हुडदंग करें सब
फागुन ने मस्ती घोली है ,
मनो बुरा, तो मानो तुम
छेड़ेंगे, आज तो होली है,
रंग कचनार के ,रंग गुलाब के, और रंग नीले पीले,
चिपक गए अंगों में सबके, सूखे हों या गीले,
मस्त तरंग में झटकी बुडिया, लागत छैल-छबीली है,
छेड़ेंगे, आज तो होली है,
बिना पिए मेरे उनके नैना, हो गए आज नशीले,
दिखा-दिखा के मस्त अदाएं, मारे बाण कटीले,
कल तक थी जो तीखी हम पर, रस से भरी वो बोली है,
छेड़ेंगे, आज तो होली है,
चरित्र पर भी चढ़ते हैं. रंगों ने किया कमाल,
पिछले साल जो नीले थे, इस साल हुए वो लाल,
कौन नशे में कहाँ गिरा, रंगों ने पोल ऐ खोली है
छेड़ेंगे, आज तो होली है,
गोपालजी
शनिवार, 20 फ़रवरी 2010
कानून का कानून
कानून के हाथ लम्बे होते हैं, इतने......ऐ
कि दू..ऊ.ऊ..र किसी बेगुनाह की
गर्दन तक पहुँच जाते हैं,
और सामने खड़े अपराधी की
गर्दन में माला पहनाते हैं,
कानून में सिर्फ यही तो एक अच्छाई है,
कि उसने अपने पैदा होने की वज़ह
दिल से अपनाई है,
जैसे चिराग तले का अँधेरा
चिराग से ही अस्तित्व में आता है,
और उसी की छत्र-छाया में
चैन की बंसी बजाता है,
सारा जग जानता है
की क़ानून और अपराध का
चोली-दामन का साथ है,
और वास्तव में क़ानून
अपराध की सगी औलाद है,
और वैसे भी संसद में पहुंचा
ज्यादातर अपराधी ही क़ानून बनाता है,
और सिर्फ सीधा-सच्चा नागरिक उसे निभाता है,
क़ानून की रोटी भी अपराध से ही चलती है,
क़ानून के रखवालों की रंगत भी
अपराध के फलने-फूलने से ही निखरती है,
भला बताइए, जिसके ऊपर क़ानून जैसी
सर्वप्रतिष्ठित सुंदरी मेहरबान हो,
क्यों न उसके चेहरे पर चिरजयी मुस्कान हो,
क्यों न उसका बोलबाला हो,
जिसका क़ानून का ऊँचा से उंचा
ओहदेदार हमप्याला हो,
इतिहास गवाह है कि,
कानून सिर्फ अपराधियों की
हिफाज़त के लिए ही जी रहा है,
आज भी, अग्नि-परीक्षित और सच्ची
सीताओं का खून पी रहा है,
कि दू..ऊ.ऊ..र किसी बेगुनाह की
गर्दन तक पहुँच जाते हैं,
और सामने खड़े अपराधी की
गर्दन में माला पहनाते हैं,
कानून में सिर्फ यही तो एक अच्छाई है,
कि उसने अपने पैदा होने की वज़ह
दिल से अपनाई है,
जैसे चिराग तले का अँधेरा
चिराग से ही अस्तित्व में आता है,
और उसी की छत्र-छाया में
चैन की बंसी बजाता है,
सारा जग जानता है
की क़ानून और अपराध का
चोली-दामन का साथ है,
और वास्तव में क़ानून
अपराध की सगी औलाद है,
और वैसे भी संसद में पहुंचा
ज्यादातर अपराधी ही क़ानून बनाता है,
और सिर्फ सीधा-सच्चा नागरिक उसे निभाता है,
क़ानून की रोटी भी अपराध से ही चलती है,
क़ानून के रखवालों की रंगत भी
अपराध के फलने-फूलने से ही निखरती है,
भला बताइए, जिसके ऊपर क़ानून जैसी
सर्वप्रतिष्ठित सुंदरी मेहरबान हो,
क्यों न उसके चेहरे पर चिरजयी मुस्कान हो,
क्यों न उसका बोलबाला हो,
जिसका क़ानून का ऊँचा से उंचा
ओहदेदार हमप्याला हो,
इतिहास गवाह है कि,
कानून सिर्फ अपराधियों की
हिफाज़त के लिए ही जी रहा है,
आज भी, अग्नि-परीक्षित और सच्ची
सीताओं का खून पी रहा है,
गोपालजी
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
आज की द्रौपदी
दुशासन को उसके दुस्साहस का सबक सिखाकर
सांप सूंघ गयी सभा के बीच
विजयी अदा से द्रोपदी मुस्कराई,
गुर्रा कर बोली
तुम क्या चीर हरोगे
मैं खुद उतार आई,
जैसे पांच, वैसे एक सों पांच,
कायरों के हुजूम से कैसा डर कैसी आंच,
सभा में सन्नाटा छा गया,
बाँकुरे गश खा गए
चमचों को मज़ा आ गया,
पराजित दुश्शासन
सभा से भागने की ताक़ में था,
क्रुद्ध दुर्योधन
शकुनी को पीटने की फिराक में था,
साले ने कहाँ का दांव लगा दिया,
बाज़ी तो जीती
पर मुसीबत में फंसा दिया,
इससे अच्छा भीम को जीत लेते,
चकाचक मालिश कराते
मौके-बेमौके पीट लेते,
उल्टा नज़ारा देख
ध्रतराष्ट्र ने जैसे ही कृष्ण को पुकारा,
फुंफकारते हुए द्रौपदी ने
उसे झन्नाटेदार थप्पड़ मारा,
क्रुद्ध होकर बोली
बोल किसे बुलाता है,
क्या अखबार नहीं पढता
रोज़ हजारों नारियां निर्वस्त्र की जाती हैं
क्या कभी वो आता है,
मुर्ख तेरी शिक्षा तो निरी अधूरी है,
नहीं जानता कि क्लीन-बोर्ड करने को
बोल्ड होना ज़रूरी है,
" गोपालजी "
सांप सूंघ गयी सभा के बीच
विजयी अदा से द्रोपदी मुस्कराई,
गुर्रा कर बोली
तुम क्या चीर हरोगे
मैं खुद उतार आई,
जैसे पांच, वैसे एक सों पांच,
कायरों के हुजूम से कैसा डर कैसी आंच,
सभा में सन्नाटा छा गया,
बाँकुरे गश खा गए
चमचों को मज़ा आ गया,
पराजित दुश्शासन
सभा से भागने की ताक़ में था,
क्रुद्ध दुर्योधन
शकुनी को पीटने की फिराक में था,
साले ने कहाँ का दांव लगा दिया,
बाज़ी तो जीती
पर मुसीबत में फंसा दिया,
इससे अच्छा भीम को जीत लेते,
चकाचक मालिश कराते
मौके-बेमौके पीट लेते,
उल्टा नज़ारा देख
ध्रतराष्ट्र ने जैसे ही कृष्ण को पुकारा,
फुंफकारते हुए द्रौपदी ने
उसे झन्नाटेदार थप्पड़ मारा,
क्रुद्ध होकर बोली
बोल किसे बुलाता है,
क्या अखबार नहीं पढता
रोज़ हजारों नारियां निर्वस्त्र की जाती हैं
क्या कभी वो आता है,
मुर्ख तेरी शिक्षा तो निरी अधूरी है,
नहीं जानता कि क्लीन-बोर्ड करने को
बोल्ड होना ज़रूरी है,
" गोपालजी "
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