ज़मीं के होते होंगे, पर समंदर बिन किनारे हैं
और उस पर डोलती नैया पे हम तेरे सहारे हैं
सहम कर करते हैं फरियाद, हर तूफां की आहट पर
अभी प्यारा न कर हमको, ख़ुदा हम तेरे प्यारे हैं .
ज़मीं के होते होंगे................
बहा के थक चुके आंसू, ऐ ज़ालिम अब रहम कर दे
इन्तहां हो चुकी, कहरों को अपने अब ख़तम कर दे
ज़ख्म पे ज़ख्म, और उसपे ज़ख्म देके क्या मिला तुझको
रहम बेचारगी पर कर हमारी, हम बेचारे हैं
ज़मीं के होते होंगे ..........
सितमगर नाम है तेरा, ऐ पुख्ता हो चूका सब पर
बाँट के दर्द सोता तू है, रौशन हो चूका सब पर
और उस पर भी सितम ऐ है, कि हम तुमसे ही रोते हैं
क्योंकि तू बन गया दिलवर, और हम सब दिल के मारे हैं
ज़मीं के होते होंगे...........
ज़रा सा मोड़ दे कश्ती, जिधर खुशियों कि महफ़िल है
न ख्वाईश ऐ मसल, आखिर हमारा दिल भी तो दिल है
न बैठा तू फ़लक पर, या ख़ुदा थोड़ी ज़मीं तो दे
नज़र आते हैं वाकई, हम सभी को दिन में तारे हैं
ज़मीं के होते होंगे.....................
" गोपालजी "
The blog consists my thoughts, bhajans, vyangs, devoted ghazals, my attainments from life and overall a logical view with traditions and all other aspects of life i.e. culture, emotionals, relationship, faith and devotions etc.
बुधवार, 20 जनवरी 2010
सोमवार, 18 जनवरी 2010
ख़फ़ा भाई
मै और मेरा प्यारा भाई, एक थाली में खाते थे,
सुख दुःख में हम, उस भाई के पहलू में सो जाते थे,
आज ख़फ़ा है भाई हमसे, दिल घुट-घुट कर रोता है,
खो गए दिन ज़ब मेरे आंसू, उन आँखों से आते थे,
खेले थे हम इन गलियों में, तब ना कोई बंधन था,
उसकी धड़कन से ही, मेरे दिल में भी स्पंदन था ,
सोंचें ग़र ईमान हम इस ख़ुदा को भी नाजिर करके ,
बेरहम ज़ुदाई लम्हों में, दोनों के दिल में क्रंदन था ,
जुदा भाई हमसे मिलने को, दिल ही दिल में तड़प रहा,
जाएं मना लें हम उसको, बस इस मकसद से झड़प रहा,
मानें ख़ता हुई दोनों से, और अब अमन बहाल करें
माफ़ करें हम एक दूजे को, पहले जैसा प्यार करें,
" गोपालजी "
सुख दुःख में हम, उस भाई के पहलू में सो जाते थे,
आज ख़फ़ा है भाई हमसे, दिल घुट-घुट कर रोता है,
खो गए दिन ज़ब मेरे आंसू, उन आँखों से आते थे,
खेले थे हम इन गलियों में, तब ना कोई बंधन था,
उसकी धड़कन से ही, मेरे दिल में भी स्पंदन था ,
सोंचें ग़र ईमान हम इस ख़ुदा को भी नाजिर करके ,
बेरहम ज़ुदाई लम्हों में, दोनों के दिल में क्रंदन था ,
जुदा भाई हमसे मिलने को, दिल ही दिल में तड़प रहा,
जाएं मना लें हम उसको, बस इस मकसद से झड़प रहा,
मानें ख़ता हुई दोनों से, और अब अमन बहाल करें
माफ़ करें हम एक दूजे को, पहले जैसा प्यार करें,
" गोपालजी "
शनिवार, 16 जनवरी 2010
परिवर्तन
धरा, प्रकृति और आस्था
परिवर्तनशील अपनी उत्पत्ति से ही
तथा हम मात्र मूल्यों एवं संस्कारों के
परिवर्तन से उत्तेजित और कुंठाग्रस्त,
अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रतिरोध के उपरांत भी
पराजित और पस्त,
क्या समझते हैं हम अपने आपको
ब्रम्ह के नियंता के समक्ष ?
उस विराट के समकक्ष ?
अहंकार ही तो है
हमें चुटकी भर ज्ञान का
और अनावृत कर देता है
हमारा विद्रूपित व्यक्तित्व ,
क्योंकि परिवर्तन
नष्ट कर डालता है अवरोधों को
और निकल जाता है नदी के प्रवाह की तरह
स्वच्छंद, उन्मुक्त, अविरल और आल्हादित ,
और तना रहता है सदैव
पर्वतों की तरह हिम से आच्छादित ,
" गोपालजी "
परिवर्तनशील अपनी उत्पत्ति से ही
तथा हम मात्र मूल्यों एवं संस्कारों के
परिवर्तन से उत्तेजित और कुंठाग्रस्त,
अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रतिरोध के उपरांत भी
पराजित और पस्त,
क्या समझते हैं हम अपने आपको
ब्रम्ह के नियंता के समक्ष ?
उस विराट के समकक्ष ?
अहंकार ही तो है
हमें चुटकी भर ज्ञान का
अपने अस्तित्व का
जो मिटा देता हँ हमारा ही अस्तित्व ,और अनावृत कर देता है
हमारा विद्रूपित व्यक्तित्व ,
क्योंकि परिवर्तन
नष्ट कर डालता है अवरोधों को
और निकल जाता है नदी के प्रवाह की तरह
स्वच्छंद, उन्मुक्त, अविरल और आल्हादित ,
और तना रहता है सदैव
पर्वतों की तरह हिम से आच्छादित ,
" गोपालजी "
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
चिंकी और चंदा मामा
जेट से चिंकी चाँद पे पहुंचा
बोला चंदा मामा
यहाँ पे बैठे ठिठुर रहे हो
चलो बुलाते नाना ,
ज़ब से घर से भाग के आये
मुह छिपाए फिरते हो ,
झांकते रहते इधर उधर से
नहि एक ज़गह टिकते हो ,
चलो ले चलो थाली अपनी
गर खो गयी तो छोडो,
थाली- प्याली के चक्कर में
घर से मुख ना मोड़ो ,
तनिक ठहर कर रोब गाँठ कर
फिर से चिंकी बोला ,
नंगे क्यों हो, कहाँ गया
नानी का दिया झिंगोला ,
कोई उत्तर ना मिलने पर
चिंकी भी झुंझलाया ,
बोला मामा हठ ने तुम्हारे
तुमसे घर छुड्वाया ,
" गोपाल जी "
बोला चंदा मामा
यहाँ पे बैठे ठिठुर रहे हो
चलो बुलाते नाना ,
ज़ब से घर से भाग के आये
मुह छिपाए फिरते हो ,
झांकते रहते इधर उधर से
नहि एक ज़गह टिकते हो ,
चलो ले चलो थाली अपनी
गर खो गयी तो छोडो,
थाली- प्याली के चक्कर में
घर से मुख ना मोड़ो ,
तनिक ठहर कर रोब गाँठ कर
फिर से चिंकी बोला ,
नंगे क्यों हो, कहाँ गया
नानी का दिया झिंगोला ,
कोई उत्तर ना मिलने पर
चिंकी भी झुंझलाया ,
बोला मामा हठ ने तुम्हारे
तुमसे घर छुड्वाया ,
" गोपाल जी "
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
एक था राजा एक थी रानी
सच है सुन लो मेरी कहानी,
एक था राजा एक थी रानी .
राजा भी वही था वही उसकी रानी,
पर अब नहीं थी उनकी जवानी
दिन जीवन में ऐसे भी आये
साया था जिन पर, हुए उनके साए
लुटा दी थी जिन पर जीवन की पूंजी
पानी पिलाने तक से वो कतराए
प्यास बुझाता था आँखों का पानी ......
एक था राजा ..............
प्यार और ममता से जो बाग़ सींचा
मुश्किलों में जिनको अपने कलेजे से भींचा
धड्काया दिल जिनका सांसों से अपनी
उन्हीं दिल के टुकड़ों ने छीना बगीचा
निशां उनके धो रही थी, उनकी निशानी .......
एक था राजा ...............
चुकी हुई जिंदगी थी, थकी हुई सांसें
अपनों से दूर दोनों अकेले में खांसें,
वारिसों ने बाँट लिया था असबाब उनका
इंतज़ार करते थे कब निकलें फांसें,
और एक दिन वो आया मरे राजा रानी .......
एक था राजा रानी ..........
आज भी है जिंदा उनकी कहानी
देखते और दोहराते हैं हम यही कहानी ......
एक था राजा ................
एक था राजा एक थी रानी .
राजा भी वही था वही उसकी रानी,
पर अब नहीं थी उनकी जवानी
दिन जीवन में ऐसे भी आये
साया था जिन पर, हुए उनके साए
लुटा दी थी जिन पर जीवन की पूंजी
पानी पिलाने तक से वो कतराए
प्यास बुझाता था आँखों का पानी ......
एक था राजा ..............
प्यार और ममता से जो बाग़ सींचा
मुश्किलों में जिनको अपने कलेजे से भींचा
धड्काया दिल जिनका सांसों से अपनी
उन्हीं दिल के टुकड़ों ने छीना बगीचा
निशां उनके धो रही थी, उनकी निशानी .......
एक था राजा ...............
चुकी हुई जिंदगी थी, थकी हुई सांसें
अपनों से दूर दोनों अकेले में खांसें,
वारिसों ने बाँट लिया था असबाब उनका
इंतज़ार करते थे कब निकलें फांसें,
और एक दिन वो आया मरे राजा रानी .......
एक था राजा रानी ..........
आज भी है जिंदा उनकी कहानी
देखते और दोहराते हैं हम यही कहानी ......
एक था राजा ................
बुधवार, 13 जनवरी 2010
सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना
जय माँ वीनावादिनी, हे माँ, हर दिल मैं खुशबू भर दे ,
मुस्काए हर जीवन माते, सबको जीभर अम्बर दे .
आये हैं हम शरण में तेरी, अभिलाषा में लेखन की ,
भाव व चिंतन के संग हमको शक्ति भी दो सच देखन की
डर से सत्य न ठुकरा दें हम, हे माँ निडर हमें कर दे
हे माँ ...........
विचलित ना हो जाएँ पथ से, संघर्षों में घबरा कर
मन का बल कहि टूट न जाये, अपनी ही पीड़ा से डरकर
शक्ति और सामर्थ्य भी देना जो लेखन को संबल दे
हे माँ ...............
अपनी वेदना और सुखों से सिर्फ रंगें ना प्रष्ठों को
लेखन में माँ हम छलकाएं मानवता के कष्टों को
जन जन के माँ काम जो आये वह लेखन मुझमें भर दे
हे माँ ...............
दी है लेखनी, दी है स्याही, तुने ही माँ भाव दिए
भाषा, बुद्धि, शब्द, चिंतन और सर्वग्राम्ह्य उदगार दिए
तेरी प्रेरणा, तुझमें निष्ठां सदा रहे मुझको वर दे
हे माँ ..............
गोपाल जी ............
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
कल का सच
तहस-नहस अपने उपवन को, हमने ही कर डाला है ,
काटा है खुद उस उपवन को, जिसने हमको पाला है .
कटते वृक्षों का रुदन शब्द हमने न सुना, पर था तो वो ,
विस्तीर्ण गगन सा फैला वन, काटा हमने कल था वो जो .
कल -कल करतीं बहती नदियाँ, हमने ही प्रदूषित कर डालीं ,
उन्मुक्त पवन का अल्हड़पन, कर दिया प्रदूषित था वो जो .
अपने ही खुनी खंज़र से, इस प्रकृति पे हमने वार किये ,
क्रूरतम प्रहारों पर उसने , माँ बनकर अपने ओठ सिये .
रिसते घावों की व्याकुलता , सूनामी से वह व्यक्त करे ,
नव-सृजन को वह भी आतुर है, मानवता से अभिव्यक्त करे .
हम मात्र द्रवित ना हो जाएँ , कष्टों से सहोदर के अपने ,
उस गर्भ का दर्द भी पहचाने , जो पूर्ण करे सबके सपने .
कभी भुज तो कभी सुनामी है , इस धरा की पीड़ा की भाषा ,
नवरचना का संकेत है ऐ, नव-सृजन की आतुर अभिलाषा .
वर्ना वह दिन अब दूर नहीं जब प्रलय से हम मिट जायेंगे ,
हम हों सचेत बस कम्पन से जब हिले धरा तोला-माशा .
गोपालजी .......
काटा है खुद उस उपवन को, जिसने हमको पाला है .
कटते वृक्षों का रुदन शब्द हमने न सुना, पर था तो वो ,
विस्तीर्ण गगन सा फैला वन, काटा हमने कल था वो जो .
कल -कल करतीं बहती नदियाँ, हमने ही प्रदूषित कर डालीं ,
उन्मुक्त पवन का अल्हड़पन, कर दिया प्रदूषित था वो जो .
अपने ही खुनी खंज़र से, इस प्रकृति पे हमने वार किये ,
क्रूरतम प्रहारों पर उसने , माँ बनकर अपने ओठ सिये .
रिसते घावों की व्याकुलता , सूनामी से वह व्यक्त करे ,
नव-सृजन को वह भी आतुर है, मानवता से अभिव्यक्त करे .
हम मात्र द्रवित ना हो जाएँ , कष्टों से सहोदर के अपने ,
उस गर्भ का दर्द भी पहचाने , जो पूर्ण करे सबके सपने .
कभी भुज तो कभी सुनामी है , इस धरा की पीड़ा की भाषा ,
नवरचना का संकेत है ऐ, नव-सृजन की आतुर अभिलाषा .
वर्ना वह दिन अब दूर नहीं जब प्रलय से हम मिट जायेंगे ,
हम हों सचेत बस कम्पन से जब हिले धरा तोला-माशा .
गोपालजी .......
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