धोबी की बढती बेरोज़गारी से बेखबर
उसकी मुफलिसी से बेअसर
दूसरों के मैल ढोकर
गधा पुण्य कमा रहा है,
देख सिमटता रोज़गार
धुलाई के नए यंत्रों से बेज़ार
वक़्त को गालियाँ चुभोकर
धोबी गर्त में धंसा जा रहा है,
सुखा ढला हुआ मर्द
ऊपर से गधे के पोषण का दर्द
धोबी का दिल कचोट रहा था,
पर गधा मस्त
गर्द में लोट रहा था,
बढ़ते-घटते भार से निर्विकार
धोबी जो दे, करके दिल से स्वीकार
समर्पण की मुद्रा में
गधा धरती निहार रहा है,
गाली भी पाकर
चाबुक भी खाकर
हमसफ़र धोबी से
हर क़दम मिलाकर
मस्ती में
योनि यह जिए जा रहा है
काटो तो खून नहीं
रोटी दो जून नहीं
धंसे हुए नैन
जुगाड़ में बेचैन
खुद के लाले
गधे को पाले
धोबी हरी घास में अकल चरा रहा है,
अपने बुने जालों में
सूदियों की चालों में
नख से नाक तक फंसा जा रहा है,
फर्क है समर्पण का
दाता को तर्पण का
गधा सर झुकाए
निश्चिन्त खड़ा है,
टूटने को तैयार
झुकना पर नागवार
जकड़ा अहंकार में
धोबी अड़ा है
गधा, गधा है
मुटा रहा है
आदमी गधा नहीं है
मरा जा रहा है
" गोपालजी "
The blog consists my thoughts, bhajans, vyangs, devoted ghazals, my attainments from life and overall a logical view with traditions and all other aspects of life i.e. culture, emotionals, relationship, faith and devotions etc.
रविवार, 31 जनवरी 2010
बुधवार, 27 जनवरी 2010
प्रभु
हमारे अंतस कि व्यथा और उस दिव्य, अलोकिक एवं सत्य कि खोज तभी समाप्त हो सकती है ज़ब हम अपने आराध्य को वापस अपने मन में स्थित कर लेंगें जिसे हमने मन से दूर मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारों में सज़ा रखा है.
गोपाल जी
गोपाल जी
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
गुरु
तर्क सदैव विधि, नियम, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक समर्पण को परास्त करता आया है नित नए मजहबों का उदय सिद्ध करता है कि उसके अनुयाइयों ने किन्हीं तर्कों से परास्त होकर ही नए की प्रासंगिकता स्वीकार की और उसे पहले से श्रेष्ठ माना, इतिहास गवाह है की हर धर्म में परिस्थितियों एवं तर्क ने प्रभाव डाला तथा हमारी पद्वातियो और आस्थाओं तक पर आमूल-चूल परिवर्तन कर डाला.
शंकराचार्य, विवेकानंद, कबीर, बुद्ध जैसे आदि संत तर्क और शास्त्रार्थ के उपरांत ही नए मजहबों को गढ़ सके या अपना सिद्धांत प्रतिपादित कर आध्यात्म के उच्च शिखर को प्राप्त कर सके. राजा राम मोहन राय जैसा असाधारण व्यक्तित्व तर्क के आधार पर ही सती प्रथा जैसी निर्दय एवं क्रूरतम परम्परा का अनुसरण समाप्त करा पाए
अतः जो आध्यात्मिक गुरु कहता है कि परमात्मा और आस्था में तर्क नहीं किया जाता, सिद्ध करता है कि उसकी अपनी आस्थाएँ कमज़ोर नीव पर खड़ी हैं. उसका उद्देश्य सत्य को जानना नहीं, अपनी कहानियों में चेलों को मस्त रखना है और माल बनाना है.
आज तक जितने भी गुरु याद किये जाते है अपने उस विलक्षण शिष्य की श्रेष्ठता के कारण ही याद किये जाते है जिसने अपनी प्रतिभा के बल पर नई ऊँचाइयों को हासिल किया तथा अपने साथ-साथ अपने गुरु का नाम भी रौशन किया. अगर गुरु में विशिष्टता होती तो उसका हर शिष्य पर्मात्मप्राप्त और श्रेष्ठ होता. विलक्षणता तो कबीर, कृष्ण और मीरा में थी जिन्होंने रामानंद, संदीपन और रैदास को अमर कर दिया.
अतः डर त्यागो और तर्क करो गुरुओं से आध्यात्म पर, परमेश्वर की प्राप्ति पर और मुक्त हो जाओ छद्म गुरुओं के चुंगुल से जो अपने वाक्जाल से तुम्हें बहला कर तुम्हारी माया लूटने के लिए ही दूकान खोले है .
स्वयं सोंचिये जो गुरु परमात्मप्राप्ति जैसा असीम सुख छोड़कर चेलों में लिप्त हो क्या उसे परमात्मा प्राप्त है ?
गोपालजी
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
सत्य का धरातल
दुर्योधन, उदास और क्लांत
मन में झंझावत, लब शांत ,
नहीं दे सका सुकूं पत्नी का आलिंगन ,
नर्तकियों का सुर-वंदन,
मनोबल है जिंदा, पर टूटा है विश्वास,
क्या इश्वर,
वास्तव में आज नहीं है हमारे पास,
यदि है
तो क्या हो गयी भूल,
क्यों चुभ रहा है हर रोज़
एक नयी हार का शूल,
मैंने तो मात्र
अपने पिता के अपमान का प्रतिघात किया,
सेना की विशालता से भी सिद्ध है
अधिकों ने मेरा साथ दिया,
अपनी पत्नी द्यूत में हारने वाले धूर्तों को
कृष्ण का सरक्षण,
बलराम के आदेश के विरुद्ध
पांडवों की रक्षा प्रतिक्षण ,
भविष्य द्रष्टा कहते थे ऐसा कलयुग में होना है,
असत्य को विजयी सत्य को धरातल खोना है,
लगता है कलयुग अभी से ही आ गया
वर्ना ऐसा न होता,
असत्य यूँ न पूजा जता
सत्य न अपना शौर्य खोता,
" दूर कहीं घड़ियाल घंटा बजा रहा है ,
मुर्दा हुए जिन्दों को शायद बता रहा है .
नैतिक पतन की चादरें लेटे हो ओढ़ कर,
सहमें डरे से सोये हो घुटनों को मोड़कर,
गर्तों की राह जाओ ना तुम सत्य छोड़कर,
वर्ना समय ही सत्य है रख देगा तोड़कर ,
हर गम को हर ख़ुशी को निर्विकार परखना,
ग़र संग चले चिर-नींद तक चिर-सत्य समझना , "
" गोपाल जी "
मन में झंझावत, लब शांत ,
नहीं दे सका सुकूं पत्नी का आलिंगन ,
नर्तकियों का सुर-वंदन,
मनोबल है जिंदा, पर टूटा है विश्वास,
क्या इश्वर,
वास्तव में आज नहीं है हमारे पास,
यदि है
तो क्या हो गयी भूल,
क्यों चुभ रहा है हर रोज़
एक नयी हार का शूल,
मैंने तो मात्र
अपने पिता के अपमान का प्रतिघात किया,
सेना की विशालता से भी सिद्ध है
अधिकों ने मेरा साथ दिया,
अपनी पत्नी द्यूत में हारने वाले धूर्तों को
कृष्ण का सरक्षण,
बलराम के आदेश के विरुद्ध
पांडवों की रक्षा प्रतिक्षण ,
भविष्य द्रष्टा कहते थे ऐसा कलयुग में होना है,
असत्य को विजयी सत्य को धरातल खोना है,
लगता है कलयुग अभी से ही आ गया
वर्ना ऐसा न होता,
असत्य यूँ न पूजा जता
सत्य न अपना शौर्य खोता,
" दूर कहीं घड़ियाल घंटा बजा रहा है ,
मुर्दा हुए जिन्दों को शायद बता रहा है .
नैतिक पतन की चादरें लेटे हो ओढ़ कर,
सहमें डरे से सोये हो घुटनों को मोड़कर,
गर्तों की राह जाओ ना तुम सत्य छोड़कर,
वर्ना समय ही सत्य है रख देगा तोड़कर ,
हर गम को हर ख़ुशी को निर्विकार परखना,
ग़र संग चले चिर-नींद तक चिर-सत्य समझना , "
" गोपाल जी "
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
बेटे की चिठ्ठी
मम्मी, मेरी चिंता मत करना
डैडी से भी कहना, न लें टेंशन मेरी फिक्र से,
उलझाये रखना उनको, बेवजह के ज़िक्र से,
माम, तुमने कहतीं थीं ,
मैं गोद में, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हें ही देखता रहता था
मेरे तुम्हारे बीच कब ऐ जहाँ आ गया
कभी समझाया नहीं,
आज फिर, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हारी गोद में
पहले जैसे निश्चिन्त
सोने का मन करता है
लेकिन तुम पास हो तब ना,
और अब लगता है यह सपना,
बागवां तो खाद-पानी देकर
आस बाँध कर
निश्चिन्त हो जाता है,
बीज को ही संघर्ष कर
अपनी जड़ें ज़माना होता है,
कौन चाहता है अपनी जड़ों दूर रहना,
लेकिन यह नियति है
हंस कर या रोकर
पड़ता ही है दर्द सहना,
माम अपने अश्कों से कहना,
प्लीज़ अब न बहना,
मेरा भी दिल कमज़ोर हो जाता है,
लाख रोकने के बावजूद
आँख के कोने से ढलक कर आंसू
की-बोर्ड को गीला कर ही जाता है,
- तुम्हारा अस्तित्व-
" गोपालजी "
डैडी से भी कहना, न लें टेंशन मेरी फिक्र से,
उलझाये रखना उनको, बेवजह के ज़िक्र से,
माम, तुमने कहतीं थीं ,
मैं गोद में, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हें ही देखता रहता था
आँचल मुठ्ठी से कब छूट गया
तुमने बताया नहीं,मेरे तुम्हारे बीच कब ऐ जहाँ आ गया
कभी समझाया नहीं,
आज फिर, तुम्हारे आँचल को पकड़
तुम्हारी गोद में
पहले जैसे निश्चिन्त
सोने का मन करता है
लेकिन तुम पास हो तब ना,
और अब लगता है यह सपना,
बागवां तो खाद-पानी देकर
आस बाँध कर
निश्चिन्त हो जाता है,
बीज को ही संघर्ष कर
अपनी जड़ें ज़माना होता है,
कौन चाहता है अपनी जड़ों दूर रहना,
लेकिन यह नियति है
हंस कर या रोकर
पड़ता ही है दर्द सहना,
माम अपने अश्कों से कहना,
प्लीज़ अब न बहना,
मेरा भी दिल कमज़ोर हो जाता है,
लाख रोकने के बावजूद
आँख के कोने से ढलक कर आंसू
की-बोर्ड को गीला कर ही जाता है,
- तुम्हारा अस्तित्व-
" गोपालजी "
बुधवार, 20 जनवरी 2010
बेदर्द से शिकायत
ज़मीं के होते होंगे, पर समंदर बिन किनारे हैं
और उस पर डोलती नैया पे हम तेरे सहारे हैं
सहम कर करते हैं फरियाद, हर तूफां की आहट पर
अभी प्यारा न कर हमको, ख़ुदा हम तेरे प्यारे हैं .
ज़मीं के होते होंगे................
बहा के थक चुके आंसू, ऐ ज़ालिम अब रहम कर दे
इन्तहां हो चुकी, कहरों को अपने अब ख़तम कर दे
ज़ख्म पे ज़ख्म, और उसपे ज़ख्म देके क्या मिला तुझको
रहम बेचारगी पर कर हमारी, हम बेचारे हैं
ज़मीं के होते होंगे ..........
सितमगर नाम है तेरा, ऐ पुख्ता हो चूका सब पर
बाँट के दर्द सोता तू है, रौशन हो चूका सब पर
और उस पर भी सितम ऐ है, कि हम तुमसे ही रोते हैं
क्योंकि तू बन गया दिलवर, और हम सब दिल के मारे हैं
ज़मीं के होते होंगे...........
ज़रा सा मोड़ दे कश्ती, जिधर खुशियों कि महफ़िल है
न ख्वाईश ऐ मसल, आखिर हमारा दिल भी तो दिल है
न बैठा तू फ़लक पर, या ख़ुदा थोड़ी ज़मीं तो दे
नज़र आते हैं वाकई, हम सभी को दिन में तारे हैं
ज़मीं के होते होंगे.....................
" गोपालजी "
और उस पर डोलती नैया पे हम तेरे सहारे हैं
सहम कर करते हैं फरियाद, हर तूफां की आहट पर
अभी प्यारा न कर हमको, ख़ुदा हम तेरे प्यारे हैं .
ज़मीं के होते होंगे................
बहा के थक चुके आंसू, ऐ ज़ालिम अब रहम कर दे
इन्तहां हो चुकी, कहरों को अपने अब ख़तम कर दे
ज़ख्म पे ज़ख्म, और उसपे ज़ख्म देके क्या मिला तुझको
रहम बेचारगी पर कर हमारी, हम बेचारे हैं
ज़मीं के होते होंगे ..........
सितमगर नाम है तेरा, ऐ पुख्ता हो चूका सब पर
बाँट के दर्द सोता तू है, रौशन हो चूका सब पर
और उस पर भी सितम ऐ है, कि हम तुमसे ही रोते हैं
क्योंकि तू बन गया दिलवर, और हम सब दिल के मारे हैं
ज़मीं के होते होंगे...........
ज़रा सा मोड़ दे कश्ती, जिधर खुशियों कि महफ़िल है
न ख्वाईश ऐ मसल, आखिर हमारा दिल भी तो दिल है
न बैठा तू फ़लक पर, या ख़ुदा थोड़ी ज़मीं तो दे
नज़र आते हैं वाकई, हम सभी को दिन में तारे हैं
ज़मीं के होते होंगे.....................
" गोपालजी "
सोमवार, 18 जनवरी 2010
ख़फ़ा भाई
मै और मेरा प्यारा भाई, एक थाली में खाते थे,
सुख दुःख में हम, उस भाई के पहलू में सो जाते थे,
आज ख़फ़ा है भाई हमसे, दिल घुट-घुट कर रोता है,
खो गए दिन ज़ब मेरे आंसू, उन आँखों से आते थे,
खेले थे हम इन गलियों में, तब ना कोई बंधन था,
उसकी धड़कन से ही, मेरे दिल में भी स्पंदन था ,
सोंचें ग़र ईमान हम इस ख़ुदा को भी नाजिर करके ,
बेरहम ज़ुदाई लम्हों में, दोनों के दिल में क्रंदन था ,
जुदा भाई हमसे मिलने को, दिल ही दिल में तड़प रहा,
जाएं मना लें हम उसको, बस इस मकसद से झड़प रहा,
मानें ख़ता हुई दोनों से, और अब अमन बहाल करें
माफ़ करें हम एक दूजे को, पहले जैसा प्यार करें,
" गोपालजी "
सुख दुःख में हम, उस भाई के पहलू में सो जाते थे,
आज ख़फ़ा है भाई हमसे, दिल घुट-घुट कर रोता है,
खो गए दिन ज़ब मेरे आंसू, उन आँखों से आते थे,
खेले थे हम इन गलियों में, तब ना कोई बंधन था,
उसकी धड़कन से ही, मेरे दिल में भी स्पंदन था ,
सोंचें ग़र ईमान हम इस ख़ुदा को भी नाजिर करके ,
बेरहम ज़ुदाई लम्हों में, दोनों के दिल में क्रंदन था ,
जुदा भाई हमसे मिलने को, दिल ही दिल में तड़प रहा,
जाएं मना लें हम उसको, बस इस मकसद से झड़प रहा,
मानें ख़ता हुई दोनों से, और अब अमन बहाल करें
माफ़ करें हम एक दूजे को, पहले जैसा प्यार करें,
" गोपालजी "
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