शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ को पत्र

माँ,
कितने गदगद थे हम उस दिन, सच में लगा था तेरे ऊपर होने वाले अत्याचार अब ख़त्म हो गए,
तू भी साँस ले सकेगी अब आज़ादी की, पर सब भ्रम निकला माँ सब झूठ .  आज अहसास हुआ कि
सत्ताएं तो बदल गयीं हमारी किस्मतें नहीं बदलीं. बदलीं हैं तो सत्ता करने वालों कि मानसिकताएं
और निश्चित रूप से उससे भी अधिक घ्रणित स्वरूपों में .
अब तो विश्वास हो चला है कि तुम शायद कभी न आज़ाद हो सकोगी, कल तक तो बाहर वालों का
अत्याचार और लूट खसूट थी, आज तो तेरे बच्चे ही तेरे आँचल को तार-तार करने पर आमादा हैं
बाहरी अक्रमंकारियों से भी अधिक क्रूरता से.
और माँ हम, निश्चित सत्य है कि हम कायर हो चुके हैं, राम कि पूजा करते हैं, कृष्ण का ध्यान
लगाते हैं, पर सब आडम्बर.  हममें आत्मबल सूख गया है, अपने सामने निरीह पर होता अत्याचार
हम बर्दाश्त करते हैं, लोकतंत्र के वासी होकर अंग्रेजों से बदतर लोगों कि गुलामी करते हैं
तुमसे आँख मिलाने का साहस नहीं है इसलिए पत्र लिख रहे हैं, हमें हमारी दशाओं पर छोड़ दो
और क्षमा करना कि हम तुम्हारे लिए कुछ न क़र सके.
  
                                                                                              गोपालजी               
            

शनिवार, 8 मई 2010

माँ

माँ को शब्दों में व्यक्त करूं
इतने मुझमें ज़ज्बात नहीं, 
भाषा, स्याही और कलम की भी 
विश्वास है ए औकात नहीं,
मेरी माँ क्या है मेरे लिए 
लिखना ही हास्यास्पद होगा
माँ साक्षात् खुद ईश्वर है
कोई ईश्वरीय सौगात नहीं,

                              गोपालजी 
           

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

छोटू है उस्ताद , ज़मीं पे ना ठहरेगा,
छू लेगा आकाश, टाप पर ही सेहरेगा,
चंचल मुस्कानों से सब के दिल को चुरा कर
शोहरत की हासिल, दौलत पे राज़ करेगा,

मंगलवार, 16 मार्च 2010

समाचार : माया की माला

बैठ गधे की पीठ बंदरिया बोली मेरे मित्र ,
लाई हूँ अख़बार आज का खबरें लिए विचित्र,   

समाचार : माया की माला

माला कर गयी गड़बड़झाला
माला में है खेल,
भारीभरकम देख के माला
कोई सका न झेल,
पहले हुई खुसुर-पुसुर,
और फिर सबने हंगामा काटा,
माला के आगे लगता है 
अपना कद सबको अब नाटा,
आपस में है तू तू-मैं मैं 
जनता को बेकूफ बनाना,
जनता सिर्फ पतीली है बस
जिसमे सब को खिड़की पकाना ,
मौसेरे भाई हैं सारे
झूठी है सब अनबन,
कोई ताज पहन हुआ राजा
कोई माला पहन टनाटन,
हम जनता हैं, किस्मत में बस  
घास है या कुछ जूठन,
लोकतंत्र ऐसा होता है
थोडा कर लें  मंथन,

गोपालजी  

दीवारों के कान

दीवारों के भी कान होते है,
आखिर कब तक खड़े-खड़े बोर होतीं 
इनके भी कुछ अरमान होते हैं,
इसलिए सुनती हैं, खूब सुनती हैं,
कुछ भी इनके बीच कहिये,
ये सुनेंगी, पर कहेंगी किसी से नहीं,
क्योंकि दीवारों के मुह नहीं होते,
कितना बड़ा दुर्भाग्य है इनका 
कि जानती तो सब हैं 
देखा सुना है सब 
पर बता नहीं सकतीं 
डरिये उनसे जिनके कान और मुह 
दोनों होते हैं,
और वही आपके गुप्त मसलों के 
सबसे बड़े दुश्मन होते हैं,
दीवारें बेचारी गवाही तक नहीं देतीं 
पर चर्चा उन्हीं के बारे में आम है,
खुराफात करते हैं दुसरे 
मुफ्त में दीवार बदनाम है,

         गोपालजी
  

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

चरित्र पर भी चढ़ते हैं. रंगों ने किया कमाल

रंग चले,  हुडदंग करें सब
फागुन ने मस्ती घोली है ,
मनो बुरा, तो मानो तुम
छेड़ेंगे, आज तो होली है,

रंग कचनार के ,रंग गुलाब के,  और रंग नीले पीले,
चिपक गए अंगों में सबके, सूखे हों या गीले,
मस्त तरंग में झटकी बुडिया, लागत छैल-छबीली है,
                 छेड़ेंगे, आज तो होली है,
बिना पिए मेरे उनके नैना, हो गए आज नशीले,
दिखा-दिखा के मस्त अदाएं, मारे बाण कटीले,
कल तक थी जो तीखी हम पर, रस से भरी वो बोली है,
                 छेड़ेंगे, आज तो होली है,
चरित्र पर भी चढ़ते हैं. रंगों ने किया कमाल,
पिछले साल जो नीले थे, इस साल हुए वो लाल,
कौन नशे में  कहाँ गिरा,  रंगों ने पोल ऐ खोली है 
                  छेड़ेंगे, आज तो होली है,
                                गोपालजी                    

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कानून का कानून

कानून के हाथ लम्बे होते हैं, इतने......ऐ
कि दू..ऊ.ऊ..र  किसी बेगुनाह की
गर्दन तक पहुँच जाते हैं,
और सामने खड़े अपराधी की
गर्दन में माला पहनाते हैं,

कानून में सिर्फ यही तो एक अच्छाई है,
कि उसने अपने पैदा होने की वज़ह
दिल से अपनाई है,
जैसे चिराग तले का अँधेरा
चिराग से ही अस्तित्व में आता है,
और उसी की छत्र-छाया में
चैन की बंसी बजाता है,

सारा जग जानता है
की क़ानून और अपराध का
चोली-दामन का साथ है,
और वास्तव में क़ानून
अपराध की सगी औलाद है,
और वैसे भी संसद में पहुंचा
ज्यादातर अपराधी ही क़ानून बनाता है,
और सिर्फ सीधा-सच्चा नागरिक उसे निभाता है,

क़ानून की रोटी भी अपराध से ही चलती है,
क़ानून के रखवालों की रंगत भी
अपराध के फलने-फूलने से ही निखरती है,
भला बताइए, जिसके ऊपर क़ानून जैसी
सर्वप्रतिष्ठित सुंदरी मेहरबान हो,
क्यों न उसके चेहरे पर चिरजयी मुस्कान हो,
क्यों न उसका बोलबाला हो,
जिसका क़ानून का ऊँचा से उंचा
ओहदेदार हमप्याला हो,

इतिहास गवाह है कि,
कानून सिर्फ अपराधियों की
हिफाज़त के लिए ही जी रहा है,
आज भी, अग्नि-परीक्षित और सच्ची
सीताओं का खून पी रहा है,

                                   गोपालजी