बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

बिट्टी कि विदाई

काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,
तेरे प्यारे बचपन को काहे खुद मार दिया,

हाथों को मल के भी       अब क्या मिलना है ,
दर्दे-विदाई को                 अश्कों से सिलना है,
तेरे भोलेपन का काहे,      मैंने न विचार किया 
       काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

सूना हुआ  कांधा मेरा, सूना हुआ आँगन,
नीर बहाएँ नैना,       बोझिल है तनमन,
तुतली बोली से काहे,  तुने इतना प्यार दिया,
       काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

जाए जहाँ तू बिट्टी,       सदा मुस्कराए
नैन न होयें गीले,         दिल गुनगुनाये
महकाए जाकर जो प्रभु ने, तुझे घर-द्वार दिया,
        काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

इस घर से नाता अपना,    भूल न जाना
ख़ुशी हो या ग़म इस घर का, साथ निभाना
रब ने सिर्फ बेटी को दो घर का अधिकार दिया
      काहे मैंने बिट्टी तुझे गोदी से उतार दिया,

     गोपालजी 

बिट्टी कि विदाई

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

बिट्टी क़ी विदाई

बिट्टी क़ी विदाई 
बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया
बचपन को तेरे मैंने, काहे खुद मार दिया 

हाथों को मल के भी, अब क्या मिलना है 
दर्द भरे दिल को बस, अश्कों से  सिलना है 
तेरे भोलेपन का मैंने, काहे न विचार किया 
           बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

इस घर से नाता अपना, भूल न जाना 
नया घर मिला है, पर ए तेरा है पुराना 
जिसे तुने ही अपने हाथों से संवार दिया 
            बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

सूना लगे कंधा मेरा, सूना लगे आँगन 
अश्क बहाएं आँखें, बोझिल है तन-मन
काहे डैडी/मम्मी  कह के तुने, मुझे  इतना प्यार दिया 
             बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

जाए जहाँ तू बिट्टी, सदा मुस्कराए 
नैन न होयें गीले, दिल गुनगुनाये 
महकाए,  इश्वर ने तुझे जो घर-द्वार दिया  
            बिट्टी काहे मैंने तुझे, गोदी से उतार दिया 

                                        गोपालजी  /  मीनाक्षी   

शुक्रवार, 21 मई 2010

माँ को पत्र

माँ,
कितने गदगद थे हम उस दिन, सच में लगा था तेरे ऊपर होने वाले अत्याचार अब ख़त्म हो गए,
तू भी साँस ले सकेगी अब आज़ादी की, पर सब भ्रम निकला माँ सब झूठ .  आज अहसास हुआ कि
सत्ताएं तो बदल गयीं हमारी किस्मतें नहीं बदलीं. बदलीं हैं तो सत्ता करने वालों कि मानसिकताएं
और निश्चित रूप से उससे भी अधिक घ्रणित स्वरूपों में .
अब तो विश्वास हो चला है कि तुम शायद कभी न आज़ाद हो सकोगी, कल तक तो बाहर वालों का
अत्याचार और लूट खसूट थी, आज तो तेरे बच्चे ही तेरे आँचल को तार-तार करने पर आमादा हैं
बाहरी अक्रमंकारियों से भी अधिक क्रूरता से.
और माँ हम, निश्चित सत्य है कि हम कायर हो चुके हैं, राम कि पूजा करते हैं, कृष्ण का ध्यान
लगाते हैं, पर सब आडम्बर.  हममें आत्मबल सूख गया है, अपने सामने निरीह पर होता अत्याचार
हम बर्दाश्त करते हैं, लोकतंत्र के वासी होकर अंग्रेजों से बदतर लोगों कि गुलामी करते हैं
तुमसे आँख मिलाने का साहस नहीं है इसलिए पत्र लिख रहे हैं, हमें हमारी दशाओं पर छोड़ दो
और क्षमा करना कि हम तुम्हारे लिए कुछ न क़र सके.
  
                                                                                              गोपालजी               
            

शनिवार, 8 मई 2010

माँ

माँ को शब्दों में व्यक्त करूं
इतने मुझमें ज़ज्बात नहीं, 
भाषा, स्याही और कलम की भी 
विश्वास है ए औकात नहीं,
मेरी माँ क्या है मेरे लिए 
लिखना ही हास्यास्पद होगा
माँ साक्षात् खुद ईश्वर है
कोई ईश्वरीय सौगात नहीं,

                              गोपालजी 
           

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

छोटू है उस्ताद , ज़मीं पे ना ठहरेगा,
छू लेगा आकाश, टाप पर ही सेहरेगा,
चंचल मुस्कानों से सब के दिल को चुरा कर
शोहरत की हासिल, दौलत पे राज़ करेगा,

मंगलवार, 16 मार्च 2010

समाचार : माया की माला

बैठ गधे की पीठ बंदरिया बोली मेरे मित्र ,
लाई हूँ अख़बार आज का खबरें लिए विचित्र,   

समाचार : माया की माला

माला कर गयी गड़बड़झाला
माला में है खेल,
भारीभरकम देख के माला
कोई सका न झेल,
पहले हुई खुसुर-पुसुर,
और फिर सबने हंगामा काटा,
माला के आगे लगता है 
अपना कद सबको अब नाटा,
आपस में है तू तू-मैं मैं 
जनता को बेकूफ बनाना,
जनता सिर्फ पतीली है बस
जिसमे सब को खिड़की पकाना ,
मौसेरे भाई हैं सारे
झूठी है सब अनबन,
कोई ताज पहन हुआ राजा
कोई माला पहन टनाटन,
हम जनता हैं, किस्मत में बस  
घास है या कुछ जूठन,
लोकतंत्र ऐसा होता है
थोडा कर लें  मंथन,

गोपालजी  

दीवारों के कान

दीवारों के भी कान होते है,
आखिर कब तक खड़े-खड़े बोर होतीं 
इनके भी कुछ अरमान होते हैं,
इसलिए सुनती हैं, खूब सुनती हैं,
कुछ भी इनके बीच कहिये,
ये सुनेंगी, पर कहेंगी किसी से नहीं,
क्योंकि दीवारों के मुह नहीं होते,
कितना बड़ा दुर्भाग्य है इनका 
कि जानती तो सब हैं 
देखा सुना है सब 
पर बता नहीं सकतीं 
डरिये उनसे जिनके कान और मुह 
दोनों होते हैं,
और वही आपके गुप्त मसलों के 
सबसे बड़े दुश्मन होते हैं,
दीवारें बेचारी गवाही तक नहीं देतीं 
पर चर्चा उन्हीं के बारे में आम है,
खुराफात करते हैं दुसरे 
मुफ्त में दीवार बदनाम है,

         गोपालजी